
दैनिक भारती अनूपपुर। पवित्र नगरी अमरकंटक में जहां लाखों श्रद्धालु मां नर्मदा के दर्शन कर पुण्य कमाते हैं ,वहीं वार्ड- 2 बराती में एक ऐसा जीवट भी रोज आस्था की परीक्षा देता है,जिसे देखकर पत्थर दिल भी पिघल जाए। 40 वर्षीय जोहन सिंह मरावी,दोनों पैरों से पूर्णतः दिव्यांग है।चलने के लिए न बैसाखी,न किसी का हाथ। कमर में जीप के टायर का कटा ट्यूब बांधते हैं,जमीन पर घिसटते-घिसटते,हाथों के बल रोज तीन किलोमीटर का सफर तय कर मां नर्मदा मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंचते हैं। मकसद भीख नहीं,दो रोटी का इंतजाम।घर में वृद्ध और मानसिक रूप से अस्वस्थ मां है। श्रद्धालुओं से जो मिल जाता है,उसी से चूल्हा जलता है। जोहन बताते हैं,पिता बारेलाल सिंह मरावी 30 साल पहले घर छोड़कर चले गए,आज तक पता नहीं।मां पर तीन बच्चे,दो बहनें लमियां बाई और झमिया बाई दोनों मानसिक अस्वस्थ,पांच साल पहले बड़ी बहन और तीन साल पहले छोटी बहन बीमारी से चल बसी। मूल गांव डिंडोरी जिले के करंजिया जनपद का बरनई है।पिता दूसरी शादी कर मौसी को लाए,फिर उसे भी छोड़ दिया।इसके बाद मां-बेटे ने अमरकंटक को ही अपना घर बना लिया। सरकार से दिव्यांग पेंशन के नाम पर सिर्फ 600 रुपये महीना,उज्ज्वला का गैस कनेक्शन नहीं,सस्ते राशन का भी भरोसा नहीं,आधार कार्ड है,वोटर लिस्ट में नाम है, स्थायी निवासी है,फिर भी योजनाएं फाइलों में अटकी हैं। कल्याण सेवा आश्रम ने तीन पहिया साइकिल दी थी,पर अमरकंटक के घाट और चढ़ाई पर वह चढ़ती ही नहीं।धकेलने वाला कोई नहीं।मजबूरी में कई बार घर जाने के लिए ऑटो करना पड़ता है,100 रुपये किराया। जो दिन भर में कमाया,आधा किराए में चला जाता है।